Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
प्रकृतस्थं बभूवास्य तच्छरीरं द्विजन्मनः ।
प्रावृट्शरीरविगमे धौतं तलमिवावनेः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
दहन, प्लावन आदि द्वारा विष्णु शरीररूप से उनकी उत्पत्ति कहने का प्रयोजन कहते है ।
जिस प्रकार शरद ऋतु में अन्तिम वृष्टि से धुला हुआ और शीघ्र सूखा हुआ रास्ता वर्षाकाल के
कीचड़ वगैरह के नष्ट हो जाने पर निर्मल हो जनता के यातायात आदि कार्य के योग्य हो जाता है उसी
प्रकार उक्त ब्राह्मण का शरीर भी दहन, प्लावन आदि की भावना से कलुषिता रहित होकर प्रकृत
समाधिरूप कार्य में स्थित हो गया