Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
त्यक्तभूतौघमननं ततो विश्वंभरं महत् ।
चिदाकाशं ततः शुद्धं सोऽभवद्बोधमागतः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार निर्विकल्प समाधि में प्रतिष्ठित उद्दालक को समाधि के परिपाक से तत्त्वसाक्षात्कार
और उसका फल ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (जो ब्रह्म को जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है) इस श्रुति में
प्रदर्शित ब्रह्मभाव प्राप्त हुआ, यह दशति हैं।
उसके अनन्तर उस समाधि से तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुए उद्दालक द्वैत के प्रतिभास से रहित होकर
जगत् के अधिष्ठानभूत शुद्धस्वरूप महत् चिदाकाश हो गये