Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 28

सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अट्टाईसवाँ सर्ग भुशुण्डाख्यायिका का सम्बन्ध, देह की अनिश्चितता तथा देहादि में आपाततः भ्रान्तिरूपता का वर्णन ।

90 verse-groups

  1. Verse 1वर्णित भुश्ुण्डाख्यायिका का उपक्रान्त उपदेश के साथ सम्बन्ध वतलाते है । महाराज वसिष्ठजी ने…
  2. Verse 2हे महाबाहो, अपने प्राण के निरोध या उपासनापूर्वक इस दृष्टि का अवलम्बन कर आप भुशुण्ड की नाई…
  3. Verse 3श्रीरामजी, निरन्तर प्राणोपासना से जनित ज्ञानात्मक योग से जिस प्रकार भुशुण्ड ने प्राप्तव्य…
  4. Verse 4उक्त प्राण और अपान की उपासना करनेवाले सभी अनासक्त, भुशुण्ड की नाई, परमपद में स्थिति प्राप…
  5. Verse 5हे श्रीरामजी, इस सब विचित्र विज्ञानोपासनाओं का आपने श्रवण किया । अब बुद्धि का अवलम्बन कर…
  6. Verse 6योग और उपासना की कथा जाने दीजिए महाराज, हमें तो एकमात्र आपके उपदेश के श्रवण से ही तत्त्वज…
  7. Verse 7महाराज आपके ही सदृश दूसरे हम लोग भी प्रबुद्ध हो गये, प्रसन्न हो गये, प्राप्तव्य अपने आत्म…
  8. Verse 8भगवन्‌, उत्तम अर्थ का अवबोधक तथा आश्चर्यजनक सर्वश्रेष्ठ भुशुण्ड का चरित्र जो आपने कहा, उस…
  9. Verses 9–10हे ब्रह्मन्‌, आपके द्वारा कहे गये इस भुशुण्ड-चरित्र मे मांस, चर्म ओर अस्थि से निर्मित शरी…
  10. Verse 11महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, परब्रह्मरूप परमार्थ तत्त्व को जानने के लिए तथा संसार हे…
  11. Verse 12पहले प्रश्न का उत्तर देते हैं। हे श्रीरामजी, इस शरीररूपी घर का जिसमें हड्डियाँ ही खम्भे ह…
  12. Verse 13श्रुति ओर पुराण की आख्यायिकाओं में यह प्रसिद्ध है कि इस देह का निर्माण करनेवाला ईश्वर है…
  13. Verse 14देह में मिथ्यात्व तो प्रतीतिकालमात्रस्थायी होने के कारण चन्द्रद्वैतता की नाई ही प्रसिद्ध…
  14. Verse 15उक्त अर्थ का ही स्पष्टीकरण करते हैं। यद्यपि वास्तव में देह असत्‌ ही है, तथापि "यह देह है"…
  15. Verse 16असत्‌ में सत्त्व का भ्रम कहाँ देखा गया है, इस शंका पर कहते हैं। स्वप्न-दशा में ही प्रतीयम…
  16. Verse 17देह की प्रतीति होने पर देह सत्य-सी है और आत्मा की प्रतीति होने पर असत्य है। मृगतृष्णिका-ज…
  17. Verse 18(उपर्युक्त विविध दृष्टान्तं से यह निश्चित हुआ कि) देह की प्रतीति होने पर ही देह सत्य-सी प…
  18. Verse 19शरीरआदि में आभासमात्रत्व का उपपादन कर रहे महाराज वस्रिष्ठजी उसमें अभिमान का परित्याग करात…
  19. Verse 20संकल्पजनित देहों की ही उदाहरणपूर्वक असत्यता बतलाते हैं। हे श्रीरामजी, भला यह आप बतलाइए कि…
  20. Verse 21जाग्रत-दशा में भी मनोराज्य में जिस देह से स्वर्गीय नगरों के अन्दर या मेरुपर्वत पर आप परिभ…
  21. Verse 22हे श्रीरामजी, स्वप्नों में भी जो दूसरा स्वप्न आता है, उस स्वप्न में जिस देह से बड़े-बड़े…
  22. Verse 23हे महाबाहो, मनोराज्य के भीतर कल्पित दूसरे मनोराज्य में बड़ी-बड़ी विभवपूर्णभूमियों में जिस…
  23. Verse 24हे महाबाहो, कल्पनाविनाश के अनन्तर विनष्ट हो जानेवाली जिन देहो से मनोराज्य में चित्र-विचित…
  24. Verse 25हे श्रीरामजी, विलासनिपुण तथा अनुराग युक्त संकल्प कान्ता के साथ जिस देह से रति-सुख का अनुभ…
  25. Verse 26उन स्वप्न-वेह आदि में मिथ्यात्व एवं कल्पितत्व आदि का निश्चय होने के कारण प्रस्तुत देह में…
  26. Verse 27अहन्ताध्यास के विषय शरीर में दिखलाया गया न्याय ममता-अध्यास के विषय धन आदि में भी समान ही…
  27. Verse 28जाग्रत देहादि में स्वप्न देहादि से जो पार्थक्य प्रतीत होता है, वह एकमात्र दीर्घकालानुवृत्…
  28. Verse 29इसीलिए आत्मतत्त्व-साक्षात्कार से इस संसार की बाध्यरूपता भी उपपन्न हो सकती है, इस आशय से क…
  29. Verses 30–31हे श्रीरामजी, स्वप्न ओर संकल्पों से (मनोराज्यों से) जैसे एक विलक्षण ही जगत की स्थिति प्रत…
  30. Verse 32कथित अर्थ के विषय में पहले उत्पत्ति-प्रकरण में विस्तार से जो कहा गया था, उसका स्मरण कराते…
  31. Verse 33ऐन्दव के उपाख्यान में जो कहा जा चुका है, उसका भी स्मरण करना चाहिए, ऐसा कहते हैं। हे श्रीर…
  32. Verse 34सुदृढ़ वासना द्वारा पहले के शरीर प्रवाह में दीर्घकालतक अभ्यस्त जिन-जिन अवयवो से सम्पन्न ज…
  33. Verse 35हे श्रीरामजी, पुरुष के उत्तम प्रयत्न से मन को अन्तर्मुख बनाकर आत्मतत्त्व का जब साक्षात्का…
  34. Verse 36हे श्रीरामजी, "यह वह हे", "यह मेरा है” और “यह मेरा संसार है” इस प्रकार भावित होनेपर देहाद…
  35. Verses 37–39हे श्रीरामजी, अत्यन्त प्रिय कान्ता की नाई तीव्र वेग से जिसकी जिस रूप से भावना की जाती है,…
  36. Verse 40हे श्रीरामजी, जिस प्रकार दिन में अभ्यस्त व्यापार ही स्वप्न में दिखलाई पडते हैं, वैसे ही स…
  37. Verse 41श्रीरामजी, दृष्टि में विषमता से आकाश में जिस प्रकार मोर पंखों का एक मुडा-सा दिखाई देता हे…
  38. Verse 42भद्र, विशुद्ध दृष्टि से जैसे आकाश में उक्त मोरपंखों का मुडा दिखलाई नहीं पडता, वैसे ही आत्…
  39. Verse 43हे श्रीरामजी, जिस प्रकार डरपोक होने पर भी पुरुष अपने मनोराज्य में कल्पित हाथी, बाघ आदि के…
  40. Verse 44चूँकि, बहिर्मुख दशा में यह अपनी आत्मा ही इस प्रकार जगद्रूप मेँ भासती है, इसलिए कौन विद्वा…
  41. Verse 45हे श्रीरामजी, उसीकी कुछ शुद्धि करनी चाहिए, जो कि भयभीत होता हे । शुद्धि से विमल हुए अद्रय…
  42. Verse 46किस उपाय से आत्मा शुद्ध होता है, इस प्रश्न पर शुद्धि का उपाय बतलाते हैँ । भद्र, सम्यक्‌ त…
  43. Verse 47दर्शनमात्र से आत्मा की शुद्धि कैसे होती है 2 इस शंका पर दृश्यरूप मल एकमात्र आभासरूप ही है…
  44. Verse 48तब सम्यक्‌ ज्ञान कैसा है, उसे कहते है । मरण, जीवन, स्वर्ग, ज्ञान ओर अज्ञान कुछ भी चैतन्य…
  45. Verse 49त्वम्‌ (अपने से भिन्न दूसरा चेतन), अहम्‌ (अपनी देह के सदृश परिच्छिन्न चेतन) आदि स्वरूप सं…
  46. Verse 50सम्यकृज्ञान का फल कहते हैं। सत्‌ और असद्रूप संसार में यानी ब्रह्म और माया दोनों से जनित व…
  47. Verse 51सम्यक्‌ तत्त्वज्ञान के कारण घटादि समस्त पदार्थों की सत्ता ओर असत्ता का निर्णय करने के अनन…
  48. Verse 52सम्यकृज्ञान के प्रभाव से मन सत्य ओर शीतल हो जाता है । वह न तो किसी की निन्दा करता है ओर न…
  49. Verse 53अपनी मुक्ति होने पर भी बन्धुजनो के बन्धन की निवृत्ति न होने के कारण उनके मरण आदि के अवलोक…
  50. Verse 54अज्ञानदशा में अपने मरण की आशंका से होनेवाला सन्ताप भी इसी उपाय से निवृत्त हो सकता है, इस…
  51. Verse 55उत्पन्न हुआ पुरुष कुछ न कुछ उत्तम वैभव आदि अवश्य ही प्राप्त करेगा, इसलिए हर्ष का अवसर ही…
  52. Verse 56इस संसार में व्यवहार कर रहे सभी मनुष्यों को दरिद्रता आदि आपदाएँ आनुषंगिकरूप से प्राप्त हु…
  53. Verse 57यह जगत-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्र में बुद्‌बुद…
  54. Verse 58जो त्रिकालाबाधित सत्यरूप वस्तु है, वह सदा ही सत्यस्वरूप है और जो असत्यरूप वस्तु है, वह सद…
  55. Verse 59मैं न वर्तमान में हूँ, न वह मेँ भूतकाल में था और न भविष्य में रहूँगा ही। यह शरीर केवल काम…
  56. Verse 60हे भद्र, यदि "अहम्‌" पदार्थ शरीर से पृथक ही है, यह मान लिया जाय, तो वह अविद्या-दोष से जनि…
  57. Verse 61हे प्रिय श्रीरामजी, सम्यकृज्ञान से युक्त मुनि का पूर्वोक्त प्रकार के निश्चयवाला अन्तःकरण…
  58. Verse 62श्रीरामजी, जिस प्रकार तित्तिरी घोंसला बनाने के लिए तिनकों के निम्नभाग के मोटे अंशों को छो…
  59. Verse 63हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार की जडता का परित्याग करने के लिए असत्यभूत इस संसार में तनिक भी आ…
  60. Verse 64हे अनघ, इसलिए “यह सब ब्रह्मरूप ही है” इस प्रकार पूर्वोक्त युक्तियों से सुदृढ निश्चय कर आप…
  61. Verse 65तव क्या आसक्ति का परित्याग कर यथेष्ट विहार करना चाहिए, इस शंका पर नहीं ऐसा उत्तर देते हैं…
  62. Verse 66यह दृश्यमान प्रपंच केवल आभासमात्र (झलकमात्र) ही है, इस प्रकार जिस महामति को भलीर्भोति अवग…
  63. Verse 67सवनिगत सन्मात्र के दर्शन में उपाय बतलाते है । हे पापशून्य श्रीरामजी, विशेषाकारता का परित्…
  64. Verse 68हे श्रीरामजी, सन्मात्ररूप आभास भी चित्त की विशेष कल्पना के कारण कलंकित ही रहता हे, इसलिए…
  65. Verse 69भद्र, जब आप आभासमात्ररूपता का परित्याग कर देगे, तब चैतन्याकाशरूप, अविनाशी, परिपूर्ण, अशेष…
  66. Verse 70निराभासता की (त्रिपुटीशून्यस्वरूपता की) सिद्धि में हेतुभूत दो प्रकार की उपासना कहते हैं।…
  67. Verse 71भद्र, अथवा मँ ओर यह सब प्रपंच चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है” इस प्रकार चिन्तन करने पर…
  68. Verse 72हे श्रीरामजी, ये दोनों भी दर्शन सत्यरूप और आत्यन्तिक-सिद्धि (मुक्तिरूप सिद्धि) देनेवाले ह…
  69. Verse 73इनका ऐच्छिक समुच्चय करने पर भी परस्पर कोई विरोध नहीं है, क्योकि फलतः दोनों एकरूप ही है, इ…
  70. Verse 74प्रधान फलों के द्वारा राग आदि दोषों के विनाश की ही स्तुति करते हैं। हे श्रीरामजी, जो कुछ…
  71. Verse 75हे श्रीरामजी, राग आदि दोषों से आक्रान्त हुई बुद्धि के द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह…
  72. Verse 76भद्र, जिस प्रकार दग्ध हुई वनस्थलियों मे हिरन अपना स्थान नहीं बनाते, उसी प्रकार द्वेष-दोषर…
  73. Verse 77हे प्रिय श्रीरामजी, जिस पुरुष के चित्तरूपी बिल में राग और द्वेषरूपी दो सर्प तिरोहित नहीं…
  74. Verse 78हे श्रीरामचन्द्रजी, जो पुरुष शास्त्रों में निष्णात, चतुर, कर्म निरत एवं प्राज्ञ होकर भी र…
  75. Verse 79समूल राग-द्वेष का क्रम बतलाते हैं। मेरा धन दूसरे ने हड़प लिया, दूसरे से अवश्य लेने योग्य…
  76. Verse 80राग-द्वेषों के क्रम तुच्छ क्यो है ? इस पर कहते हैं। धन, बंधुवर्ग, मित्र - ये सब बार-बार आ…
  77. Verse 81जिसमें संसार की परिपूर्णरूपता प्रिय विषयों के अस्तित्व ओर अप्रिय विषयों के अभाव से ही बनी…
  78. Verse 82हे राघव, न धन, नजन और न मन ही वास्तव में सत्यस्वरूप है, किन्तु आगे कही जानेवाली युक्ति से…
  79. Verse 83उसी युक्ति को बतलाते हैं। आदि ओर अन्त में यानी पूर्व ओर उत्तरकाल में सभी पदार्थ असत्‌ हैं…
  80. Verse 84हे प्रिय श्रीरामजी, किसी एक ने तो आकाश में सत्री की कल्पना की ओर दूरवर्ती दूसरा उसे भोगे,…
  81. Verse 85यह संसार प्राणियों के वेगपूर्वक गमन आगमन से पूर्ण, विस्तृत एवं उपद्रवो से भरा है, इसलिये…
  82. Verse 86से सभी जगह अवस्थित है ओर सुषुप्त की नाई स्वप्नभावापन्न है
  83. Verse 87हे श्रीरामजी, यह संसार दीर्घकालीन स्वप्न-नगर एवं स्वप्न वृक्ष के सदश हे । अज्ञानरूपी निद्…
  84. Verse 88भद्र, उस घन अज्ञानरूपी विस्तृत इस निद्रा का आप उस प्रकार परित्याग कर दीजिए, जिस प्रकार नि…
  85. Verse 89भद्र, अब आप प्रबुद्ध हो जाइए और सदा उदित-स्वभाव, अशेष विकल्पों से वर्जित चैतन्य- प्रकाशस्…
  86. Verse 90हे महाबाहो, मैं आपको बार-बार संबोधित करता हू कि आप जाग जाइए, जाग जाइए ओर अपने निर्मल आत्म…
  87. Verse 91हे श्रीरामजी, मधुर गर्जन के सदुश उपदेश के शब्दों से सम्पन्न, मेघ स्थानीय इस मेरे द्वारा ब…
  88. Verse 92हे राघव, आप आज ही प्रबुद्ध होकर आत्मज्ञान को प्राप्त कीजिए ओर इस तुच्छ जागतिक भ्रम का परि…
  89. Verse 93श्रीरामजी, न आपका जन्म हे, न आपको दुःख है, न आपके दोष हैं और न आपके भ्रम ही है, (अतः) समस…
  90. Verses 94–95उपसंहार करते हैं। हे महात्मन्‌, आपके समस्त संकल्प-विकल्पात्मक दोषों का समूह नष्ट हो चुका…