Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verses 37–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
सत्यो यो भाव्यते राम भावनादार्ढ्यसंभवः ।
भावितं तीव्रवेगेन यदेवाशु तदेव हि ॥ ३७ ॥
सर्वत्र दृश्यते राम कान्तेवात्यन्तवल्लभा ।
अहर्व्यावृत्तिरभ्यस्ता यथा स्वप्नेषु दृश्यते ॥ ३८ ॥
तथायं भावनाभ्यस्तः संसारोऽप्यवलोक्यते ।
यथा स्वप्नावनौ क्षिप्रमहर्यदवभासते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, अत्यन्त प्रिय
कान्ता की नाई तीव्र वेग से जिसकी जिस रूप से भावना की जाती है, तत्काल ही वह तद्रूप सर्वत्र
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