Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
देहाद्विचिन्तितो देहः स्थितोऽन्यस्तद्वदेव हि ।
प्राक्प्रवाहचिराभ्यस्तो वासनातिशयेन यः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
सुदृढ़ वासना द्वारा पहले के शरीर प्रवाह में दीर्घकालतक
अभ्यस्त जिन-जिन अवयवो से सम्पन्न जैसी देह रहती है, उन्हीं अवयव-संस्थानों से सम्पन्न उसी
प्रकार की देह पुन: दिखलाई पड़ती है