Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 80
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 80 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 80
संस्कृत श्लोक
इति संव्यवहारेहाः के रागद्वेषयोः क्रमाः ।
धनानि बन्धवो मित्रं पुनरायान्ति यान्ति च ॥ ८० ॥
हिन्दी अर्थ
राग-द्वेषों के क्रम तुच्छ क्यो है ? इस पर कहते हैं।
धन, बंधुवर्ग, मित्र - ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं, इसलिए उनमें बुद्धिमान पुरुष क्या
अनुराग करेगा ओर क्या वैराग्य ही करेगा ?