Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
क्व बघ्नाति रतिं प्राज्ञो ह्यन्यकल्पितखद्रुमे ।
एकेन कल्पिता खे स्त्री भुङ्क्ते तां दूरगोऽपरः ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय श्रीरामजी, किसी एक ने तो आकाश में सत्री की
कल्पना की ओर दूरवर्ती दूसरा उसे भोगे, यह कभी बन सकता है ? ठीक इसी प्रकार यह संसार-रचना
है यानी इस संसार की कोई एक तो कल्पना करता है ओर दूसरा उपभोग करने की चेष्टा करता हे,
इसलिए आप ऐसे असंगत भ्रम में मत पड़िए