Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
दीर्घं वापि मनोराज्यं संसारं रघुनन्दन ।
प्रबोधमेष्यसि यदा परमात्मेच्छया स्वया ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए आत्मतत्त्व-साक्षात्कार से इस संसार की बाध्यरूपता भी उपपन्न हो सकती है, इस
आशय से कहते हैं।
हे श्रीरामजी, निजी परमात्मा की इच्छा से जब आप तत्त्वज्ञान को प्राप्त होगे, तब आप इस संसार
को इस तरह आत्ममात्ररूप देखेंगे। जिस तरह सूर्योदय होने पर प्रबुद्ध हुआ पुरुष स्वाप्निक पदार्थों को
आत्मरूप देखता है