Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
तथेदमल्पकालस्थमपि संलक्ष्यते स्थिरम् ।
व्योमन्येव यथा तापतप्ते संदृश्यते सरित् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जिस प्रकार दिन में अभ्यस्त व्यापार ही स्वप्न में दिखलाई
पडते हैं, वैसे ही संसार भी भावना से अभ्यस्त ही दिखलाई देता हे ॥३ ८॥ शीघ्रविनाशी जो क्षण आदि
काल है, वह जैसे स्वप्न भूमि में तीस घडी के दिन के रूप में दीर्घं प्रतीत होता हे, वैसे ही यह संसार
स्वल्पकालस्थायी होने पर भी स्थिर (शाश्वत) लक्षित होता है ॥३ ९॥ जैसे सूर्यताप से सन्तप्त मरुभूमि
के आकाश में मृगतृष्णा नदी दिखाई देती है, वैसे ही यह अविद्यमान भी पृथिवी, अन्तरिक्ष एवं त्रिलोकी
सभी संकल्पं से दिखाई देते हैं