Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
मनसः स्वयमेवान्तःसंकल्पकलनोद्भवा ।
विचित्ररचनोपेतं मनस्तत्रात्तविभ्रमम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित अर्थ के विषय में पहले उत्पत्ति-प्रकरण में विस्तार से जो कहा गया था, उसका स्मरण
कराते हैं।
जैसे मैंने पहले कमलोद्भव ब्रह्मदेव की उत्पत्ति मन से कही है, वैसे ही यह जगत की उत्पत्ति भी
स्वयं मन के भीतरी संकल्पकलन से ही हुई है ॥३ १॥ जैसे चित्र-विचित्र रचनाओं से युक्त तथा अनेक
प्रकार के विभ्रमों से ग्रस्त मन ही ब्रह्मा की उत्पत्ति में कारण है, वैसे ही यह जगत् अवभास में भी एकमात्र
संकल्पकलनरूप मन ही कारण है