Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
सम्यग्दृष्ट्या जगल्लक्ष्मीस्तथेयं नावभासते ।
भीरुरभ्येति न यथा स्वसंकल्पेषु संभ्रमम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जिस
प्रकार डरपोक होने पर भी पुरुष अपने मनोराज्य में कल्पित हाथी, बाघ आदि के रहते भय को प्राप्त
नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञ पुरुष अपने मानसिक संकल्पो से जनित इस संसार के रहते भय को प्राप्त
नहीं होता