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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

आस्थारहितया बुद्ध्या विहर्तव्यमिहानघ । कर्तव्यमेव कर्तव्यमकर्तव्यमुपेक्ष्यते ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

तव क्या आसक्ति का परित्याग कर यथेष्ट विहार करना चाहिए, इस शंका पर नहीं ऐसा उत्तर देते हैं । भद्र, विवेक -बुद्धि से आसक्ति ओर अनासक्ति का परित्याग कर अनायास से शास्त्रविहित कर्मो का ही अनुष्ठान करना चाहिए, शास्त्र-अविहित कर्मो का नहीं अर्थात्‌ उनकी उपेक्षा ही कर देना चाहिए