Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
देहो देहविधौ सत्यो ह्यसत्य इतरद्विधौ ।
प्रतिभासविधौ तावज्जलं सदसदन्यदा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
देह की प्रतीति होने पर देह सत्य-सी है और आत्मा की प्रतीति होने पर
असत्य है। मृगतृष्णिका-जल भी मृगतृष्णा का प्रतिभास होने पर सत्-सा रहता है और अन्यकाल में
असत् ही रहता है