Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 83
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 83
संस्कृत श्लोक
मिथ्यैव मिथ्यावसितमितीदं परिलक्ष्यते ।
आद्यन्तयोः सर्वमसन्मध्येऽप्यस्थिरमाधिमत् ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी युक्ति को बतलाते हैं।
आदि ओर अन्त में यानी पूर्व ओर उत्तरकाल में सभी पदार्थ असत् हैं और वीच में भी उत्तरोत्तर
भाव-विकारों से ग्रस्त एवं दुःखप्रद हैं, इसलिए बुद्धिमान पुरुष दूसरे के कल्पित आकाश-वृक्ष के सदृश
तुच्छ इस संसार में कहाँ प्रेम करेगा ?