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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 87

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 87

संस्कृत श्लोक

सर्वत्र संस्थमेवेदं सुषुप्तमिव विच्युतम् । परिपश्यसि संसारदीर्घस्वप्नपुरद्रुमम् ॥ ८७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, यह संसार दीर्घकालीन स्वप्न-नगर एवं स्वप्न वृक्ष के सदश हे । अज्ञानरूपी निद्रा का लाभ लेकर आत्मस्वभाव का अपहरण करनेवाला एवं निरन्तर अनुस्यूत है, इसलिए आप संसाररूपी स्वप्न में भ्रमणशील होकर यहाँ अवस्थित हैं