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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

द्विचन्द्रदर्शनविधौ चन्द्रद्वित्वं सदैव हि । वस्तुतश्चैक एवेन्दुः स्थितो देहस्तथैव हि ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

देह में मिथ्यात्व तो प्रतीतिकालमात्रस्थायी होने के कारण चन्द्रद्वैतता की नाई ही प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं। जैसे चन्द्रमा की द्वैतता दो चन्द्रो के दर्शन की क्रिया के होने पर ही यानी चक्षु को अंगुलि से दबाने पर ही प्रतीत होती है, वास्तव में तो चन्द्रमा सदा एक ही है, वैसे ही आत्मा के देहवैशिष्ट्य-ज्ञानक्रिया के होने पर ही देह प्रतीत होती है, वस्तुतः आत्मा निरन्तर एक ही है । तात्पर्य यह हुआ कि प्रतीयमान चन्द्रद्नतता जैसे विभ्रममात्र है, वैसे ही प्रतीयमान यह देह भी विभ्रममात्र ही है