Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अयं नामाहमित्यन्तर्गृहीतमननं स्थितम् ।
मांसास्थिमयनिर्माणदेहोऽहमिति विभ्रमम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीरआदि में आभासमात्रत्व का उपपादन कर रहे महाराज वस्रिष्ठजी उसमें अभिमान का परित्याग
कराते हैं।
हे श्रीरामजी, "यह शरीर ही मैं हूँ” यह जो अनुभव होता है, वह पूर्व में गृहीत देहाकार मनन ही है
यानी देहाकार मनन ही संस्कारों की दृढ़ता से बार-बार देह के आकार में स्थित रहता है; इसलिए मांस
और अस्थि के विकारों से बना शरीर ही “मे हूँ” इस अभिमान का आप परित्याग कर दीजिए। भद्र,
मिथ्यासंकल्प से जनित ये हजारों की संख्या में देह विद्यमान हैं