Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

शीतलां सत्यतामेति सम्यगालोकनान्मनः । अवश्यमेव मर्तव्यं सर्वैरेव हि बन्धुभिः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी मुक्ति होने पर भी बन्धुजनो के बन्धन की निवृत्ति न होने के कारण उनके मरण आदि के अवलोकन से जनित सन्ताप की निवृत्ति तो हो नहीं सकती, इस पर कहते है । श्रीरामजी, चूँकि सभी बन्धुजनो को तो अवश्य ही मरना है, इसलिए उन बन्धुजनो का वियोग होने पर आप निरर्थक क्यों सन्तप्त होते हैं ?