Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 78
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 78 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 78
संस्कृत श्लोक
यस्य कल्पतरोस्तस्मात्किं नामाङ्ग न लभ्यते ।
ये हि प्राज्ञाः स्वनियता विदग्धाः शास्त्रशालिनः ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, जो पुरुष शास्त्रों में निष्णात, चतुर, कर्म निरत एवं प्राज्ञ होकर भी राग, द्वेष आदि से
परिपूर्ण हैं, वे निश्चय ही अरण्य में प्रसिद्ध सियार हैं । उन्हें धिक्कार है