Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
संसारसरणिस्थित्यां कस्मात्कोऽत्र विभेति किम् ।
स एव किंचित्संशोध्यः शुद्ध्या विमलतां गते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, उसीकी
कुछ शुद्धि करनी चाहिए, जो कि भयभीत होता हे । शुद्धि से विमल हुए अद्रय आत्मा में यह मोह, जो
जगत के लिए स्थित है, दिखलाई नहीं पडता