Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 128
एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड्डाईसवाँ सर्ग प्रविलापनयुक्ति से भरद्राज मुनि की कृतार्थता, ज्ञानियों के कर्तव्य तथा राम के व्युत्थापन का क्रम-यह वर्णन |
40 verse-groups
- Verses 1–5“शान्तो दान्त उपरतस्तितिश्चः श्रद्धावित्तः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति इत्यादि…
- Verses 6–7देह, इन्द्रिय आदि में जिसकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उसका उसमें लय कर दे, यह जो कहा गया है…
- Verses 8–11अपने श्रोत्रेन्द्रिय का दिशाओं में और त्वगिन्द्रिय का विद्युत् मेँ लय कर दे । चक्षुरिन्द…
- Verse 12देह, इन्द्रिय आदि को विलीन करने का तरीका बतलानेवाले संग्रह श्लोक को यों बतलाकर अब “विराजि…
- Verse 13*अव्याकृते स्थित: पश्चात्” (अव्याकृत में स्थित होकर उसके पीछे) इसकी व्याख्या के प्रसंग म…
- Verse 14वह सबका पिता होने से ही अपने विरचित, देव, मनुष्य आदिरूप समस्त जगत को अन्न-पान आदि के द्वा…
- Verses 15–19जल से द्विगुण तेज है, तेज से द्विगुण वायु है और वायु से द्विगुण आकाश है । यों क्रमशः एक द…
- Verses 20–22चार मुखवाला शरीर ही हिरण्यगर्भनाम से लोक में प्रसिद्ध है, जिसकी कमल से उत्पत्ति हुई है, य…
- Verse 23कैसे स्थित रहते हैं, यह कहते हैं। जब तक दूसरी सृष्टि नहीं होती तब तक परस्पर के सम्बन्ध से…
- Verse 24अनुलोमक्रम से यानी आकाशादि क्रम से सृष्टि होती है और प्रतिलोमक्रम से यानी सृष्टि के विपरी…
- Verse 25“नान्तः प्रज्ञम्“ इत्यादि श्रुति में लिंग का बाध दिखाई नहीं देता, इसलिए कैसे उसकी निवृत्…
- Verses 26–27इस तरह वाल्मीकि महाराज ने भरद्वाज को प्रणव के अर्थ का विस्तार कर बोध किया ओर इससे वे ज्ञा…
- Verse 28किस तरह के अभेद से तुम परमात्मारूप बन गये हो, इस पर कहते हैं। जैसे एक ही घट का घट और कलश…
- Verses 29–33यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीर क्षीरे धृते धृतम् । अविशेषो भवेत् तद्बज्जीवात्मा परमात्मनि ॥…
- Verses 34–39(निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निर्जनम्” इत्यादि श्रुति के साथ अपना अनुभव मिलाकर बत…
- Verse 40कैसे आनन्दस्वरूप को प्राप्त होता है, इस पर कहते हैँ । मुझसे अतिरिक्त कोई दूसरा चिदानन्दमय…
- Verse 41इस तरह भरद्वाज के द्वारा कहे गये अनुभव को चुनकर सन्तुष्ट हुए वाल्मीकि मुनि भरद्वाज के अनु…
- Verses 42–43भरद्वाज ने कहा : हे गुरो, आपके द्वारा कहा गया यह सब ज्ञान मुझे अवगत हो गया, मेरी बुद्धि ए…
- Verse 44(7)) "पाठक्रम की अपेक्षा अर्थक्रम बलवान होता है” इस न्याय के अनुसार इस श्लोक में भरद्वाज…
- Verses 45–51सम्पूर्ण मानसिक गुणों के त्याग से पूणनिन्द, अद्रय, विशुद्ध, असंग, चिदेकरसत्वादि ब्रह्म के…
- Verse 52उस अमृत के सागर में विश्रान्त हो जाने पर आपको द्वेतदर्शन की ही प्राप्ति नहीं है, फिर कर्म…
- Verses 53–54पूर्व में कहे गये महेश्वर की उपासना करके उससे दया प्राप्त कर लेने पर तुम्हें वस्निष्ठजी क…
- Verses 55–60उसमें शास्त्राचार्यों के उपदेश तथा अपने अनुभव की एकार्थनिष्ठता के निश्चय के लिए अर्थचिन्त…
- Verse 61अपना शरीर छोडकर श्रीरामजी के शरीर में प्रविष्ट होकर मैने कुण्डलिनी का संचार आदि तो किया ह…
- Verse 62श्रीरामचन्द्रजी अच्छे शिष्य है, यह दशति है। आपके शिष्य श्रीरामचन्द्रजी भी विशुद्धात्मा ओर…
- Verse 63गुरुवाक्यश्रवण से होनेवाले बोध में शिष्य की बुद्धि ही कारण है । काम, कर्म ओर वासनारूप तीन…
- Verse 64अच्छे बुद्धिमान शिष्यो की उपस्थिति में शास्त्र सफल हुआ अवश्य देखा गया है, यह कहते हैं। यह…
- Verses 65–67यों महाराज वस्निष्ठजी की प्रशसा करके उपस्थित कर्तव्य बतलाते हैँ । भगवन्, हम लोगों के ऊपर…
- Verses 68–70दूसरे कार्यो को दिखलाते हुए स्पष्टरूप से देवकार्य वतलाते है । जब मैं श्रीरामचन्द्रजी को अ…
- Verses 71–73सीताहरणप्रयुक्त हुई दुर्गति के बहाने रावण आदि का वध करके भी इस पृथिवी के ऊपर स्त्री मे आस…
- Verses 74–75कर्ममार्ग मे प्रवृत्त होकर केवल वर्तमान काल के मनुष्य का ही भगवान उस पृथिवी पर उपकार नहीं…
- Verses 76–84अव सामाजिको मे श्रीरामचन्द्रजी की भक्ति बढ़ाते हुए श्री विश्वामित्रजी कहते है । हे सत्पुर…
- Verses 85–93यही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ज्ञानयुक्त, नित्यमुक्त, माया के नियामक तथा माया के भीतर बद्ध…
- Verses 94–101इन्होंने अपने अवतार से रघु के वंश को भी पवित्र कर डाला है, यह कहते हैं। हे वसिष्ठजी, हम ल…
- Verses 102–103श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, आपकी दया से यह जीव अब विधि ओर निषेध का पात्र नहीं रहा…
- Verses 104–106परमपुरुषार्थ दानरूप गुरु द्वारा किये गये उपकार की कोई दूसरी निष्कृति न देख रहे श्रीरामजी…
- Verses 107–109हे महाराज श्रीरामचन्द्रजी, आप सुखी होइये, आपको नमस्कार हँ । अब हम लोग वसिष्ठजी से भी अनुम…
- Verse 110अब उपसंहार करते है । हे भरद्वाज, महाराज वसिष्ठजी की वचनपंक्तिरूपी रत्नमाला से भूषित यह जो…
- Verse 111जो कोई इस वसिष्ठ ओर श्रीरामचन्द्रजी के संवाद प्रकार को प्रतिदिन सुनेगा, वह मोह-मालिन्य-रा…
- Verses 1–5॥ श्री गणेशाय नमः ॥ आदिकवि श्रीमद्वाल्मीकिमहामुनिप्रणीत श्रीं योगवासिष्ठ महारमायण परमहंस…