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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 71–73

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 71–73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 71-73

संस्कृत श्लोक

उद्धरिष्यति तीर्थानि प्राणिनो विविधानि हि । सीताहरणदौर्गत्यच्छलेन भुवि शोच्यताम् ॥ ७१ ॥ दर्शयिष्यति सर्वेषां रावणादिवधादपि । स्त्रीसङ्गिनामथास्वास्थ्यं वानरादेः परावृतिम् ॥ ७२ ॥ सीताविशुद्धिमन्विच्छँल्लोकानुमतिमात्मनः । जीवन्मुक्तो निस्पृहोपि क्रियाकाण्डपरायणः ॥ ७३ ॥

हिन्दी अर्थ

सीताहरणप्रयुक्त हुई दुर्गति के बहाने रावण आदि का वध करके भी इस पृथिवी के ऊपर स्त्री मे आसक्त हुए सभी पुरुषों की केसी दुर्गति होती है, यह दिखला्येगे ओर तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी इन्द्र के वरदान द्वारा युद्ध में मरे हुए वानर, रीछ आदि पुनः कैसे जी उठे - यह भी दिखलायेंगे | उसके बाद अग्नि में प्रवेश द्वारा सीता की शुद्धि की इच्छा कर रहे भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी शिष्ट पुरुषों में अपने उत्तम चरित्र की माननीयता दश्यिंगे । तदनन्तर राज्य मेँ अभिषिक्त होकर स्वयं जीवन्मुक्त तथा निःस्पृह होते हुए भी कर्म करने के अधिकारी पुरुषों को कमनुष्ठान से ही गति मिलती है, यह दिखलाने के लिए क्रियाकाण्ड में तत्पर होगे एवं ज्ञान (उपासना) और कर्म दोनों के अधिकारी पुरुषों को ब्रह्मलोक आदि की गति दिखलाने के लिए उपासना ओर कर्म दोनों का समुच्चय करेगे