Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
कूटस्थः केवलो व्यापी चिदचिच्छक्तिमानहम् ।
घटाभावे घटाकाशकलशाकाशयोर्यथा ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
किस तरह के अभेद से तुम परमात्मारूप बन गये हो, इस पर कहते हैं।
जैसे एक ही घट का घट और कलश यों भिन्न-भिन्न नाम कल्पित है इसीसे घटयुक्त आकाश में
घटाकाश और कलशाकाश यों भिन्न-भिन्न नाम कल्पित है और इसी से घटयुक्त आकाश में घटाकाश
और कलशाकाश यों भिन्न-भिन्न व्यवहार कल्पित है, वैसे ही एक ही अज्ञान का भिन्न-भिन्न जगत
नाम कल्पित है । इसी से जगद्युक्त मुझमें जीव, ईश्वर आदि भिन्न-भिन्न व्यवहारो की कल्पना की
गयी थी। जैसे व्यवहार में एक घट के ही नाश से घट ओर कलश दोनों की निवृत्ति हो जाने से घटाकाश,
कलशाकाश, महाकाश आदि भेद मिटकर शुद्ध आकाशरूप एेक्य बन जाता है, वैसे ही एकमात्र अज्ञान
की ही निवृत्ति हो जाने से सब नामों का भेद मिटकर एकमात्र चैतन्य का साम्राज्य मुझे प्राप्त हो गया है ।
इसी तरह की एकता के उद्देश्य से ही ब्रह्मभूत हुए मेरे विषय में “यत्र नान्यत्पश्यति" इत्यादि अनेक
श्रुतियाँ बड़े आदर से कहती हैं