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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 102–103

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 102–103 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 102,103

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । न विधेर्न निषेधस्य त्वत्प्रसादादयं प्रभुः । तथापि तव वाक्यं तु करणीयं हि सर्वदा ॥ १०२ ॥ वेदागमपुराणेषु स्मृतिष्वपि महामुने । गुरुवाक्यं विधिः प्रोक्तो निषेधस्तद्विपर्ययः ॥ १०३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, आपकी दया से यह जीव अब विधि ओर निषेध का पात्र नहीं रहा, साक्षात्‌ प्रभुस्वरूप (ब्रह्मरूप) हो गया है; तथापि आपका वाक्य तो मुझे सर्वदा पालन करना ही होगा । हे महामुने, वेदो, आगमो, पुराणों ओर स्मृतियो मेँ भी गुरुवाक्य ही विधि कही गयी हे ओर उसके विरुद्ध आचरण करना निषेध कहा गया है