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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 74–75

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 74–75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 74,75

संस्कृत श्लोक

भविष्यति गतिं द्रष्टुं ज्ञानकर्मसमुच्चयौ । यैर्दृष्टो यैः स्मृतो वापि यैः श्रुतो बोधितस्तु यैः ॥ ७४ ॥ सर्वावस्थागतानां तु जीवन्मुक्तिं प्रदास्यति । इति कार्यमशेषेण त्रैलोक्यस्य ममापि हि ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्ममार्ग मे प्रवृत्त होकर केवल वर्तमान काल के मनुष्य का ही भगवान उस पृथिवी पर उपकार नहीं करेगे, बल्कि उत्तरकाल में स्मरण, कीर्तन तथा अपने चरित्र के प्रबोधन आदि के द्वारा अपने अनुगत भक्तों को जीवन्मुक्ति-चुख भी प्रदान करेगे, यह कहते है । जो लोग भगवान्‌ का दर्शन करेगे, उनके चरित्र का स्मरण तथा श्रवण करेंगे एवं जो लोग भगवान के स्वरूप का दूसरों को बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओं में अनुगत अपने भक्तों को भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक्ति-सुख प्रदान करेगे। इस तरह तीनों लोक का तथा मेरा भी हित इस महापुरुष महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा सम्पूर्णरूप से सम्पन्न होगा