Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 45–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 45–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 45-51
संस्कृत श्लोक
काम्यं कर्म निषिद्धं च न कर्तव्यं विशेषतः ।
यदा ब्रह्मगुणैर्जीवो युक्तस्त्यक्त्वा मनोगुणान् ॥ ४५ ॥
संशान्तकरणग्रामस्तदा स्यात्सर्वगः प्रभुः ।
देहेन्द्रियमनोबुद्धेः परस्तस्माच्च यः परः ॥ ४६ ॥
सोऽहमस्मि यदा ध्यायेत्तदा जीवो विमुच्यते ।
कर्तृभोक्त्त्रादिनिर्मुक्तः सर्वोपाधिविवर्जितः ॥ ४७ ॥
सुखदुःखविनिर्मुक्तस्तदानीं विप्रमुच्यते ।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ॥ ४८ ॥
यदा पश्यत्यभेदेन तदा जीवो विमुच्यते ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं हित्वा स्थानत्रयं यदा ॥ ४९ ॥
विशेत्तुरीयमानन्दं तदा जीवो विमुच्यते ।
जीवस्य च तुरीयाख्या स्थितिर्या परमात्मनि ॥ ५० ॥
अवस्थाबीजनिद्रादिनिर्मुक्ता चित्सुखात्मिका ।
योगस्य सेयं वा निष्ठा सुखं संवेदनं महत् ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण मानसिक गुणों के त्याग से पूणनिन्द, अद्रय, विशुद्ध, असंग, चिदेकरसत्वादि ब्रह्म के गुणों
की प्राप्ति होने पर ही यह जीव ज्ञानी बन सकता है, अन्यथा नहीं, यह कहते हैं।
मन के गुणों को छोड़कर जब जीव ब्रह्म के गुणों से युक्त हो जाता है तब इसकी सभी इन्द्र्यो
शान्त हो जाती हैं और यह सर्वव्यापी प्रभु बन जाता है। देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि इन चार कोशों से
चाहिए, या नहीं । और दूसरा यह है, यदि उसके लिए कर्मों का विधान है तो उसे पहले के सदृश
नित्य, नैमित्तिक और काम्य सभी कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिए अथवा कामनारहित होकर अपने
आश्रम के उचित कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिए । यद्यपि “सखे संन्यस्य कर्माणि" इस पूर्व के श्लोक
से प्रतिपादित सर्वकर्मसंन्यास को भरद्वाज ने ज्ञानी के कार्यरूप से सुना ही है, इसलिए इस तरह के
दोनों प्रश्नों को करना अयुक्त-सा प्रतीत हो रहा है, तथापि (यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति)
(जीवनपर्यन्त अग्नि होत्र होम करे) इत्यादि श्रुतियों से जीवनपर्यन्त कर्तव्यरूप से बतलाये गये कर्मो
का “दीक्षितो न ददाति न जुहोति” इत्यादि वाक्यों से दीक्षा-करण में परित्याग कर दिये जाने पर भी
दीक्षा की समाप्ति हो जाने पर जैसे उनका अंगीकार किया जाता है, वैसे ही 'त्यजतैव हि तज्ज्ञेयम्
“एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इत्यादि श्रुतिवाक्यों से ब्रह्मजिज्ञासा के निमित्त छोड़े
गये कर्मो का भी ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के बाद निमित्त के हट जाने पर फिर अंगीकार का प्रसंग आ
सकता है । यदि इस विषय मे यह शंका हो कि “सखे संन्यस्य कर्माणि“ इत्यादि वाक्यो से विद्वानों
के लिए ही सब कर्मो का संन्यास विहित है, अतः ज्ञानियोँ को कर्मानिष्ठान की प्राप्ति ही नहीं हो
सकती, तो यह भी शंका नगण्य है, क्योकि जिन लोगों ने पूर्व जन्म में ज्ञान की इच्छा से सब कर्मो
का संन्यास किया है, उनको उनसे ही गृहस्थ आदि आश्रमां में तत्त्वज्ञान हो जाता है, ऐसे विशेष
पुरुषों के प्रति "सखे संन्यस्य“ इत्यादि से किसी प्राप्त संन्यास का ही विधान किया गया है, अतः
उक्त वाक्य में ज्ञानेच्छा के लिए संन्यास परिपालन विधान की शक्ति ही नहीं रहती, इससे निचोड़
यह निकला कि श्री भरद्वाज ने जो प्रश्न किये हैं, वे युक्त पूर्ण है, युक्ति से रहित नहीं हैँ ।
परे जो आनन्दमय कोशात्मा है तथा उससे भी परे जो अधिष्ठान ब्रह्म है वही मैं हूँ, इस तरह जब जीव
ध्यान करता है तब मुक्त होता हे । कर्ता, कार्य ओर करण; भोग्य, भोक्ता ओर भोग; ज्ञाता, ज्ञान ओर
ज्ञेय - इनसे विनिर्मुक्त तथा इनके प्रयोजक सम्पूर्णं देहादि उपाधियों से एवं इनके फलस्वरूप सुख
ओर दुःखों से जब जीव विनिर्मुक्त होता है तब बिलकुल पूर्णरूप से मुक्त होता है । सम्पूर्ण भूतों में
अपने को तथा अपने में सम्पूर्णं भूतो को जब जीव अभेदरूप से देखने लगता है तब वह मुक्त होता हे ।
जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति इन तीनों स्थानों को छोडकर जब जीव तुरीय आत्मानन्दरूप में प्रवेश
करता है तब मुक्त होता हे । जाग्रत ओर स्वप्नावस्था की बीज तथा सुषुप्ति से रहित जो जीव की
परमात्मा मेँ स्थिति रूप चैतन्यसुखात्मिका तुरीयावस्था है वही योग की (निदिध्यासन के परिपाक से
जन्य निर्विकल्प समाधि की अथवा मुख्य अधिकारी के विचारमात्र से जन्य साक्षात्कारात्मक ज्ञान की)
परिसमाप्ति है, जो सबसे बड़ा सुखात्मक ज्ञान हे । मन के अस्त हो जाने पर मनुष्यों को ओर किसी
दूसरी वस्तु की उपलब्धि नहीं होती