Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 53–54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 53–54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 53,54

संस्कृत श्लोक

मज्ज मज्जसि किं द्वैतग्रहक्षाराब्धिवीचिषु । भज संभरिताभोगं परमेशं जगद्गुरुम् ॥ ५३ ॥ इति ते वर्णितं सर्वं वसिष्ठस्योपदेशनम् । अनेन ज्ञानमार्गेण योगमार्गेण पुत्रक ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व में कहे गये महेश्वर की उपासना करके उससे दया प्राप्त कर लेने पर तुम्हें वस्निष्ठजी के द्वारा कहे गये ज्ञानमार्ग से या योगमार्ग से तत्त्वज्ञान हो जाने के बाद एक के विज्ञान से सबका विज्ञान हो जाने पर तथा सम्पूर्ण संशयों के मूल अज्ञान का नाश हो जाने पर सव सन्देहो के विच्छेद से - विश्रान्ति अवश्य होगी, यह उपसंहार करते हैं। हे प्रिय, अपने भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के वास्ते अर्धनारीश्वर आदि वेष धारण किये हुए जगद्गुरु सगुण परमेश्वर की उपासना करो, यह जो वसिष्ठ महाराज ने तुम्हें उपदेश दिया है, हे महाप्राज्ञ भरद्वाज, उनके इसी ज्ञानमार्ग या योगमार्ग से तुम सब कुछ जान जाओगे, यह बिलकुल निश्चित है - इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है