Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
चतुर्मुखोऽग्रके चायं भूतसूक्ष्मव्यवस्थितः ।
लिङ्गमव्याकृते सूक्ष्मे न्यस्याव्यक्ते च बुद्धिमान् ॥ २० ॥
नामरूपविनिर्मुक्तं यस्मिन्संतिष्ठते जगत् ।
तमाहुः प्रकृतिं केचिन्मायामेके परे त्वणून् ॥ २१ ॥
अविद्यामपरे प्राहुस्तर्कविभ्रान्तचेतसः ।
तत्र सर्वे लयं गत्वा तिष्ठन्त्यव्यक्तरूपिणः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चार मुखवाला शरीर ही हिरण्यगर्भनाम से लोक में प्रसिद्ध है, जिसकी कमल से उत्पत्ति हुई है, यह
तो भूतसूक्ष्मसमष्ट्यात्मा चार मुखवाला नहीं है, फिर यह हिरण्यगर्भ कैसे हो सकता है, यदि यह आशंका
हो, तो इस पर कहते हैं।
सूक्ष्मभूतं मे अभिमान करके बैठा हुआ यही - ब्रह्माण्ड-प्रविलापन के पहले ब्रह्माण्डगत ऐश्वर्यो
का भोग करने के लिए कमल से उत्पन्न अपने शरीर की कल्पना करके चारमुखवाला था। (ऐसे हिरण्यगर्भ
की आत्मभावना करने के अनन्तर कर्तव्य बतलाते हैं) अपंचीकृत भूतों की भी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म
उपाधिरूप से अव्याकृत मायांश में तथा उपहित चिदाकार से अव्यक्त में लिंग शरीर को भी विलीन कर
बुद्धिमान् योगी स्थित रहे । जिसमें यह समस्त जगत रहता है वह अव्याकृत ओर अव्यक्त नाम ओर
रूपों से विनिर्मुक्त हे । उसीको कोई (सांख्यवादी) प्रकृति, कोई (वेदान्ती लोग) माया तथा दूसरे
(नैयायिक) परमाणु कहते हैं । तर्कं से विभ्रान्त चित्तवाले कोई (बौद्ध लोग) उसे संवृतिरूप अविद्या
कहते हैं । उस अव्याकृत मेँ प्रलयकाल में सभी पदार्थ लय को (षष्ठभावविकार को) प्राप्त होकर
अनभिव्यक्त स्वरूप को धारण करते हुए उसकी सत्ता से ही अवस्थित रहते हैँ