Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 76–84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 76–84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 76-84
संस्कृत श्लोक
अनेन रामचन्द्रेण पुरुषेण महात्मना ।
नमोऽस्मै जितमेवैते कोऽप्येवं चिरमेधताम् ॥ ७६ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इति श्रुत्वा च ते सर्वे विश्वामित्रेण भाषितम् ।
सिद्धाश्च वरयोगीन्द्रा वसिष्ठप्रमुखाः पुनः ॥ ७७ ॥
रामाङ्गिपद्मरजसामादरस्मरणास्थिताः ।
दूरश्रुतोत्तरकथाः कथया मैथिलीपतेः ॥ ७८ ॥
न संतुतोष भगवान्वसिष्ठोऽन्ये महर्षयः ।
गुणान्गुणनिधेस्तस्य ब्रुवन्नाकर्णयञ्छ्रुतम् ॥ ७९ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विश्वामित्रमुनिं प्राह वसिष्ठो भगवानृषिः ।
ब्रूहि विश्वामित्र मुने रामो राजीवलोचनः ।
कोऽयमभूद्बुधः किं वा मनुष्यो वाथ राघवः ॥ ८० ॥
विश्वामित्र उवाच ।
अत्रैव कुरु विश्वासमयं स पुरुषः परः ।
विश्वार्थमथिताम्भोधिर्गम्भीरागमगोचरः ॥ ८१ ॥
परिपूर्णपरानन्दः समः श्रीवत्सलाञ्छनः ।
सर्वेषां प्राणिनां रामः प्रदाता सुप्रसादितः ॥ ८२ ॥
अयं निहन्ति कुपितः सृजत्ययमसत्सकान् ।
विश्वादिर्विश्वजनको धाता भर्ता महासखः ॥ ८३ ॥
अयं व्युत्क्रान्तनिःसारमृदुसंसारधूर्तकैः ।
आनन्दसिन्धुर्विततो वीतरागैर्विगाह्यते ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
अव सामाजिको मे श्रीरामचन्द्रजी की भक्ति बढ़ाते हुए श्री विश्वामित्रजी कहते है ।
हे सत्पुरुषो, आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी को नमस्कार कीजिये । एकमात्र इनके
नमस्कार से ही आप लोग सबको जीत लेंगे अर्थात् आप लोगों को किसी दूसरे साधन की आवश्यकता
न होगी । आप लोगों में कोई भी पुरुष श्रेष्ठ भगवान श्रीरामचन्द्रजी की नाई ही जीवन्मुक्त होकर
निर्विकल्प समाधि में विश्रान्ति पाकर सुखपूर्वक बढ़ता रहे । वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्राज, इस
तरह का विश्वामित्र का भाषण सुनकर वे सिद्ध तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ योगीन्द्र सब श्री रामचन्द्रजी
की उत्तरचरित्ररूप दुर्लभ कथा सुनकर पुनः भगवान श्रीराम के चरणकमलरज के आदर में यानी
नमस्कार में तथा उनके स्मरण में आस्थायुक्त हो गये । मेथिलीपति श्रीराम की कथा सुनने से
भगवान् वसिष्ठजी तथा ओर दूसरे महर्षि भी तृप्त न हो सके, इसलिए उन सबने दूसरों के द्वारा कहे
गये गुण के सागर उनके गुणों का श्रवण किया तथा सुने गये गुणों का दूसरों से वर्णन किया ।
तदनन्तर भगवान वसिष्ठ ऋषि विश्वामित्र मुनि से कहने लगे : हे मुने विश्वामित्रजी, इन श्रोताओं
को आप साफ-साफ बतला दीजिये कि ये राजीवलोचन रघुकुलसमुद्भव श्रीरामचन्द्रजी इस जन्म
के पहले देव या मनुष्य क्या थे ? ()) विश्वामित्रजी ने कहा : हे सज्जनो, आप सब लोग इन्हीं
श्रीरामचन्द्रजी में (~) विश्वास कर लीजिये कि परमपुरुष साक्षात् भगवान् वासुदेव ये ही हैं, विश्व
के कल्याण के लिए जिन्होने क्षीरसागर का मंथन किया था तथा गूढ़ अभिप्राय से भरी उपनिषदों
के तत्त्वगोचर ये ही हैं अर्थात् किसी अन्य प्रमाण के विषय ये नहीं हैं । परिपूर्णपरानन्द, समस्वरूप,
श्रीवत्समणि के चिह्न से सुशोभित यही श्रीरामचन्द्रजी भक्ति से भलीर्भोति प्रसन्न कर दिये जाने पर
(7)) अज्ञजनों के अभिप्राय के अनुसार यह प्रश्न किया गया है ।
(७) अज्ञजनों के अभिप्राय के अनुसार ही यह उत्तर भी दिया गया है ।
सब प्राणियों को सब पुरुषार्थो के प्रदाता होते हैं कुपित होकर यही श्रीरामचन्द्रजी सबका संहार
करते हैं और यही मिथ्या पदार्थों की सृष्टि करते हैं यही विश्व के आदि तथा विश्व के उत्पादक
हैं और यही विश्व के धाता, पालनकर्ता तथा महासखा भी हैँ । जिन्होंने अपने विचार द्वारा निःसार
और कोमल कार्यकारणबन्धरूप संसार का बाध कर दिया है ऐसे संसार की खिल्ली उड़ानेवाले
वीतराग यति लोग इसी आनन्द के सागर में गोते लगाते है