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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 55–60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 55–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 55-60

संस्कृत श्लोक

भरद्वाज महाप्राज्ञ सर्वं ज्ञास्यसि निश्चितम् । परामर्शेन शास्त्रस्य गुरुवाक्यार्थबोधनात् ॥ ५५ ॥ अभ्यासात्सर्वसिद्धिः स्यादिति वेदानुशासनम् । तस्मात्त्वं सर्वमुत्सृज्य कुर्वभ्यासे स्थिरं मनः ॥ ५६ ॥ भरद्वाज उवाच । रामः प्राप्तः परं योगं स्वात्मनात्मनि हे मुने । कथं वसिष्ठदेवेन व्यवहारपरः कृतः ॥ ५७ ॥ इति ज्ञात्वाहमप्येवमभ्यासार्थं यते यथा । तथैव व्यवहारोऽपि व्युत्थाने मे भविष्यति ॥ ५८ ॥ श्रीवाल्मीकिरुवाच । यदा परिणतः साधुः स्वस्वरूपे महामनाः । विश्वामित्रस्तदोवाच वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ५९ ॥ विश्वामित्र उवाच । हे वसिष्ठ महाभाग ब्रह्मपुत्र महानसि । गुरुत्वं शक्तिपातेन तत्क्षणादेव दर्शितम् ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें शास्त्राचार्यों के उपदेश तथा अपने अनुभव की एकार्थनिष्ठता के निश्चय के लिए अर्थचिन्तनावृत्तिरूप परामर्श (विचार) और शब्दघोषणावृत्तिरूप (एक ही शब्द को बार-बार रटनारूप) अभ्यास अवश्य करना चाहिए, यह कहते हैं। क्योंकि शास्त्रों के विचार से, गुरु के वाक्यों का अर्थ ठीक-ठीक समझने से तथा अभ्यास से सब कार्यो की सिद्धि होती है, यह वेदों का अनुशासन है। इसलिए हे भरद्वाज, तुम सब कुछ छोड़-छाड़कर केवल अभ्यास में अपना मन स्थिर करो। भरद्वाज ने कहा : हे मुने, श्रीरामचन्द्रजी तो ब्रह्म में अपने से ही परमयोग को यानी उपाधि के त्याग से ऐक्य को प्राप्त हो गये, किन्तु फिर महाराज वसिष्ठजी ने उन्हें व्यवहार में केसे लगाया। यह जानकर मैं भी इसी तरह के अभ्यास के लिये यत्न करूँगा और समाधि से उठने के बाद मेरा भी वैसा ही व्यवहार चलेगा | वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, जब महामना साधु-स्वभाव श्रीरामजी अपने स्वरूप में अवस्थित हो गये,तब ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठजी से विश्वामित्र कहने लगे : हे ब्रह्मपुत्र महाभाग वसिष्ठजी, आप महान्‌ हैं । पहले कहे गये शक्तिपात के द्वारा शिष्योद्धारसामर्थ्यरूप अपना गुरुत्व (शिक्षकत्व) आपने शीघ्र ही हम लोगों को दिखला दिया