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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

स यज्ञसृष्टिरूपोऽसौ जगद्वृत्तौ व्यवस्थितः । द्विगुणाण्डाद्वहिः पृथ्वी पृथिव्या द्विगुणं जलम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

वह सबका पिता होने से ही अपने विरचित, देव, मनुष्य आदिरूप समस्त जगत को अन्न-पान आदि के द्वारा जीवित रखने के उपाय में व्यवस्थित होकर हविष्‌ तथा वृष्टि आदि से सबके पोषक श्रौत-स्मार्त यज्ञों की सृष्टिरूप से ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित है। (प्रासंगिक बात बतलाकर प्रस्तुत देहेन्द्रियादि का विलय बतलाने के लिए ब्रह्माण्ड का आवरण बतलाते हैं।) इस ब्रह्माण्ड के घेरे से बाहर द्विगुण पृथिवी है ओर उस पृथिवी से द्विगुण जल है ('एमिरावरणैरण्डं व्याप्तं दशगुणोत्तरै:” इत्यादिरूप से ब्रह्माण्ड की अपेक्षा उत्तरोत्तर दस गुण अधिक पृथिवी आदि का आवरण यद्यपि पुरुषों में सुना जाता है तथापि द्विगुण ही उसे भी समझना चाहिए, क्योकि चारों ओर से धेरकर पाँच कोश की प्रदक्षिणा करने पर जैसे पचीस कोश की प्रदक्षिणा हो जाती है वैसे ही एक के पचगुने को दो बार गुण देने से दसगुने की सिद्धि हो जाती है अथवा पुराणों मे जो आवरण कहा गया मिलता है वह अपंचीकृत भूतो का आवरण है, कितु यहाँ तो पंचीकृतभूतों के अभिप्राय से कहा गया है, यो किसी तरह का विरोध नहीं दीखता)