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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

निःसंबन्धा निरास्वादाः संभवन्ति ततः पुनः । तत्स्वरूपा हि तिष्ठन्ति यावत्सृष्टिः प्रवर्तते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

कैसे स्थित रहते हैं, यह कहते हैं। जब तक दूसरी सृष्टि नहीं होती तब तक परस्पर के सम्बन्ध से शून्य तथा चिति की भोग्यतारूप आस्वाद से रहित होकर उस अव्याकृत स्वरूप में ही स्थित रहते हैं और प्रलय के अनन्तर सृष्टिकाल में फिर उसी प्रकृतिभूत अव्याकृत से सब उत्पन्न होते हैं