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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 68–70

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 68–70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 68-70

संस्कृत श्लोक

सिद्धाश्रमं मया नीतो रामो राक्षसमर्दनम् । करिष्यति ततोऽहल्यामुक्तिं च जनकात्मजाम् ॥ ६८ ॥ परिणेष्यति कोदण्डभङ्गेन कृतनिश्चयः । रामस्य जामदग्न्यस्य कर्ता नष्टां गतिं ध्रुवम् ॥ ६९ ॥ पितृपैतामहं राज्यं विगतोऽभयनिस्पृहः । वनवासच्छलेनेह दण्डकारण्यवासिनः ॥ ७० ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरे कार्यो को दिखलाते हुए स्पष्टरूप से देवकार्य वतलाते है । जब मैं श्रीरामचन्द्रजी को अपने आश्रम ले जाऊँगा तब वे राक्षसो का नाश करेगे ओर उसके बाद अहल्या को शाप से मुक्त करेगे । तदनन्तर निश्चय करके भगवान्‌ शंकर का धनुष तोड़कर जनकदुलारी सीता के साथ अपना विवाह करेगे । ओर यह भी निश्चित है कि जमदग्नि के लड़के परशुराम की गति को (परलोकमार्ग को) वे नष्ट कर देंगे । इस संसार में पिता-पितामह के राज्य को छोड़-छाड़कर वनवास के बहाने जंगल में पहुँच करके जीवन्मुक्त होने के कारण ही अभय ओर निःस्पृह होते हुए श्रीरामचन्द्रजी दण्डकारण्य के निवासी मुनियों, अनेक तीर्थो तथा अन्यान्य प्राणियों का राक्षसो का वध करके भय से उद्धार करेगे