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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

मनस्यस्तं गते पुंसां तदन्यन्नोपलभ्यते । प्रशान्तामृतकल्लोले केवलामृतवारिधौ ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

उस अमृत के सागर में विश्रान्त हो जाने पर आपको द्वेतदर्शन की ही प्राप्ति नहीं है, फिर कर्मरूपी लवणसागर के तरंगों में डूबने की तो बात ही दूर रही, इस आशय से कहते हैं। सखे, (यदि तुम्हे समुद्र में डूबना ही है, तो) प्रशान्त तथा अमृतमय तरगों से पूर्ण केवल आनन्दामृत के समुद्र में क्यों नहीं डूबते ? व्यर्थ द्वैतरूप मकरों से पूर्ण लवणसागर के तरगों में क्यों ङवते हो ?