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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

आनुलोम्यात्स्मृता सृष्टिः प्रातिलोम्येन संहृतिः । अतः स्थानत्रयं त्यक्त्वा तुरीयं पदमव्ययम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अनुलोमक्रम से यानी आकाशादि क्रम से सृष्टि होती है और प्रतिलोमक्रम से यानी सृष्टि के विपरीत क्रम से उसी में सबका संहार होता हे । इसलिए तीनों स्थान को यानी विराट्‌, हिरण्यगर्भ ओर अव्याकृत या स्थूल, सूक्ष्म और कारण अथवा जाग्रत्‌, स्वप्न ओर सुषुप्ति को छोडकर (&) अविनाशी तुरीय पद का तब तक ध्यान करे जब तक उसकी साक्षात्‌ प्राप्ति न हो जाय । ध्यान से दीप्त हुई आखिरी साक्षात्कारात्मक वृत्ति से, ध्यान के कर्ता ओर कारणरूप लिंग का भी प्रविलापन कर निरतिशय परब्रह्म में उस प्रकार प्रविष्ट हो जाय, जिस प्रकार घट के विनष्ट हो जाने पर घटाकाश महाकाश में प्रविष्ट हो जाता हे