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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्तं वा निवृत्तं वा कर्तव्यं च न वा प्रभो । श्रीवाल्मीकिरुवाच । तस्माद्यन्न कृते दोषस्तत्कर्तव्यं मुमुक्षुभिः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

(7)) "पाठक्रम की अपेक्षा अर्थक्रम बलवान होता है” इस न्याय के अनुसार इस श्लोक में भरद्वाज ने दो प्रश्न किये हैं | उनमें पहला यह है - जीवन्मुक्त ज्ञानी को कर्मो का अनुष्ठान करना सबसे पहले तुम्हें काम्य निषिद्ध कर्मो का एवं ज्ञानविरोधी विक्षेप आदि दोषों को पैदा करनेवाले अन्यान्य कर्मो का त्यागकर शास्त्र के अभ्यास द्वारा ज्ञानी वन जाना चाहिए । इसके बाद तुम स्वयं ही ज्ञानी के कर्म कैसे होते हैं! इस प्रश्न का उत्तर जान जाओगे । जब क्रमशः तत्‌-तत्‌ भूमिका परिपक्र हो जाती है । तब तत्‌-तत्‌ कर्मो की शान्ति जो होती है उसका उसी समय तुम अनुभव कर सकते हो ओर प्रारब्ध कर्मो की विचित्रता होने के कारण ज्ञानियो की एकरूप से स्थिति दिखाई न पड़ने से -ज्ञानियो के कर्म प्रवृत्यात्मक ही हैं या निवृत्त्यात्मक ही है" - एसा नियम तो कोई नहीं कर सकता । इस आशय से वाल्मीकि महाराज उत्तर देते हैं । वाल्मीकिजी ने कहा : इसलिए सम्पूर्ण कर्मो के त्याग के साथ ब्रह्म मेँ एकमात्र आसक्त हो जाना ही संसारभ्रम के निवर्तक ज्ञान में उपाय है, इस मेरे उपदिष्ट अर्थ का अच्छी तरह ज्ञान कर लेने से तुम्हारे सदृश मुमुक्षु पुरुषों को - वही कर्म करना चाहिए, जिस कर्म का सम्पादन करने पर श्रवण आदि में कोई विघ्नरूप दोष न आ पड़े तथा चित्त में विक्षेप डालनेवाले मालिन्य पातकादि और किसी तरह का दूसरा दोष न उपस्थित हो जाय । विशेष करके मुमुक्ष को काम्य, निषिद्ध तथा दृष्टि के विक्षेप मेँ साधनभूत कोई कर्म नहीं करना चाहिए