Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 8–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 8–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 8-11
संस्कृत श्लोक
श्रोत्रादिलक्षणोपेतां कर्तुर्भोगप्रसिद्धये ।
दिक्षु न्यस्यात्मनः श्रोत्रं त्वचं विद्युति निक्षिपेत् ॥ ८ ॥
चक्षुरादित्यबिम्बे च जिह्वामप्सु विनिक्षिपेत् ।
प्राणं वायौ वाचमग्नौ पाणिमिन्द्रे विनिक्षिपेत् ॥ ९ ॥
विष्णौ तथात्मनः पादौ पायुं मित्रे तथैव च ।
उपस्थं कश्यपे न्यस्य मनश्चन्द्रे निवेशयेत् ॥ १० ॥
बुद्धिं ब्रह्मणि संयच्छेदेताः करणदेवताः ।
इन्द्रियव्यपदेशेन व्यादिश्यन्ते च देवताः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने श्रोत्रेन्द्रिय का दिशाओं
में और त्वगिन्द्रिय का विद्युत् मेँ लय कर दे । चक्षुरिन्द्रिय का सूर्य में तथा रसनेन्द्रिय का जल के देवता
वरुण में लय कर दे । प्राण का वायु में, वाणी का अग्नि में ओर हस्तेन्द्रिय का इन्द्र मेँ लय कर दे अपने
पादेन्द्रिय का विष्णु मेँ तथा गुदा-इन्द्रिय का मित्र में लय कर दे । उपस्थेन्द्रिय का कश्यप में लय करके
उसके वाद मन का चन्द्रमा मेँ लय कर दे | इसी तरह बुद्धि का चतुर्मुख ब्रह्मा मेँ लय कर दे । हे मित्र,
इन्द्रियों के बहाने देवता ही सब स्थित हैं, इन्द्रियों के नाम से कोई दूसरी वस्तुएँ स्थित नहीं हैं, इनका मैं
तुम्हें तत््वोपदेश द्वारा लय करने का आदेश “अग्निवाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्" (वाणी बनकर अग्नि मुख में
प्रविष्ट हो गयी) इस श्रुतिवाक्य को प्रमाण मानकर ही दे रहा हूं । स्वतः अपने मन से किसी तरह की
कोई कल्पना करके मेने इन अर्थो को तुझसे प्रकट नहीं किया हे