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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

श्रुतिवाक्यमनुस्मृत्य न स्वतः प्रकटीकृताः । एवं न्यस्यात्मनो देहं विराडस्मीति चिन्तयेत् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

देह, इन्द्रिय आदि को विलीन करने का तरीका बतलानेवाले संग्रह श्लोक को यों बतलाकर अब “विराजि प्रथमं स्थित्वा“ (विराट्‌ मैं ही हूँ, इस भावना से पहले विराटू-रूप में स्थित होकर) इस उक्ति को ओर साफ करके बतला रहे हैं। इस तरह अपनी देह को उसके कारण में विलीन करके “मे विराट्‌ हूँ” ऐसा चिन्तन करे