Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
ज्ञानं प्रत्यक्षमेवेदं गुरुशिष्यप्रयोजनम् ।
उभावपि यतो योग्यौ सर्वेषामीदृशामपि ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
अच्छे बुद्धिमान शिष्यो की उपस्थिति में शास्त्र सफल हुआ अवश्य देखा गया है, यह कहते हैं।
यह ज्ञान ही गुरु और शिष्य का प्रत्यक्ष प्रयोजन है, क्योकि यदि गुरु और शिष्य दोनों योग्य होंगे,
तो इस तरह के कैवल्यरूपी सब पुरुषार्थो के भी वे भाजन अवश्य होगे ही