Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
ध्यायेत्तत्प्राप्तये लिङ्गं प्रविलाप्य परं विशेत् ।
भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
“नान्तः प्रज्ञम्“ इत्यादि श्रुति में लिंग का बाध दिखाई नहीं देता, इसलिए कैसे उसकी निवृत्ति
(&) अर्थात् “नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञं न प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनम्" इस श्रुति द्वारा
दिखाये गये मार्ग से छोडकर ।
होगी, यह आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि तीनों स्थानों का बाध होने पर लिंग का बाध अर्थतः
सिद्ध हो जाता है, क्योकि स्थूलयूक्ष्मघूत और इन्द्रिय आदि में ही लिंग की स्थिति है, यह दिखलाते हैं ।
शुद्ध ब्रह्म में जब कि अज्ञान का आवरण आ जाता है तब अव्याकृत के अस्तित्व में सूक्ष्मभूत द्वारा
लिंग की उत्पत्ति होती है, इसलिए निष्कर्ष यह निकला कि किसी हालत में भी अज्ञान के बिना लिंग की
उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः अज्ञान ही लिंग का मूलाधार ठहरा । परम्परया स्थूलसूक्ष्मभूत, इन्द्रिय,
मन, बुद्धि, वासना, कर्म ओर वायु भी उसके आधार हैँ । ऐसी दशा में अज्ञानरूप मूल आधार की निवृत्ति
हो जाने पर लिंगरूपी बेडी का भंग सिद्ध ही हो जाता है