Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 15–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 15–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 15-19
संस्कृत श्लोक
सलिलाद्द्विगुणं तेजस्तेजसो द्विगुणोऽनिलः ।
वायोर्द्विगुणमाकाशमूर्ध्वमेकैकशः क्रमात् ॥ १५ ॥
व्यस्तेन च समस्तेन व्यापिना ग्रथितं जगत् ।
क्षितिं चाप्सु समावेश्य सलिलं चानले क्षिपेत् ॥ १६ ॥
अग्निं वायौ समावेश्य वायुं च नभसि क्षिपेत् ।
नभश्च महदाकाशे समस्तोत्पत्तिकारणे ॥ १७ ॥
स्थित्वा तस्मिन्क्षणं योगी लिङ्गमात्रशरीरधृक् ।
वासना भूतसूक्ष्माश्च कर्माविद्ये तथैव च ॥ १८ ॥
दशेन्द्रियमनोबुद्धिरेतल्लिङ्गं विदुर्बुधाः ।
ततोऽर्धोण्डाद्बहिर्यातस्तत्रात्मास्मीति चिन्तयेत् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जल से द्विगुण तेज है, तेज से द्विगुण वायु है और वायु से द्विगुण आकाश है । यों क्रमशः
एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर द्विगुण है । पंचीकृत या अपंचीकृत आकाश से यह सारा जगत् ग्रथित
है । योगी को चाहिए कि वह पृथिवी का जल में लय करके उस जल को फिर तेज में लीन कर दे। तेज को
वायु में विलीन करके उस वायु को फिर आकाश में विलीन कर दे ओर आकाश को समस्त स्थूल प्रपंचं
की उत्पत्ति के कारणभूत हिरण्यगर्भाकाश में विलीन कर दे । उस हिरण्यगर्भाकाश में एकमात्र लिंग
शरीर धारणकर योगी क्षणभर स्थित रहे। (योगी का वह लिंग शरीर क्या है, इस पर कहते हैं) वासनाएँ,
सूक्ष्मभूत, कर्म, अविद्या, दस इन्द्र्यो, मन और बुद्धि - इन सबको पण्डित लोग लिंग शरीर कहते हैँ ।
तदनन्तर स्थूल उपाधि का लय हो जाने से अर्धं शरीर से सम्पन्न हुआ-सा वह योगी ब्रह्माण्डरूपता के
अभिमान का त्याग करके उससे बाहर निकल कर सूक्ष्मभूतात्मक लिंगसमष्टिदेह में “मे ही आत्मरूप
अधिष्ठाता हिरण्यगर्भ हूँ” यों चिन्तन करे