Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 29–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 29–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 29-33
संस्कृत श्लोक
तमाहुः श्रुतयो बह्व्य एवमेवैक्यमादरात् ।
यथाग्निरग्नौ संक्षिप्तः समानत्वमनुव्रजेत् ॥ २९ ॥
तदाख्यस्तन्मयो भूत्वा गृह्यते न विशेषतः ।
यथा तृणादिकं क्षिप्तं रुमायां लवणं भवेत् ॥ ३० ॥
अचेतनं जगन्न्यस्तं चैतन्ये चेतनी भवेत् ।
यथा वै लवणग्रन्थिः समुद्रे सैन्धवो यथा ॥ ३१ ॥
नामरूपाद्विनिर्मुक्तः प्रविश्यैति समुद्रताम् ।
यथा जले जलं न्यस्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम् ॥ ३२ ॥
अविनष्टा भवन्त्येते गृह्यन्ते न विशेषतः ।
तथाहं सर्वभावेन प्रविष्टश्चेतने सति ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीर क्षीरे धृते धृतम् । अविशेषो भवेत् तद्बज्जीवात्मा परमात्मनि ॥”
(जैसे जल मे डाला गया जल, दूध में डाला गया दूध और घी में डाला गया धी एकरूप हो जाता
है वैसे ही परमात्मा मेँ जीव एकरूप हो जाता है ।) इत्यादि श्रुतियो से ऐसा ही ऐक्य दिखलाया गया
है, इस आशय से उदाहरण देते है ।
जैसे अग्नि में छोड़ा गया अग्नि उसी की समानता को (एकता को) प्राप्त होता है और तद्रूप एवं
उसी नाम का होकर ही वह ज्ञात होता है, किसी विशेषरूप से वह ज्ञात नहीं होता तथा जैसे लवणसागर
में फेंका गया तृण आदि लवणरूप ही हो जाता है वैसे ही चेतन में फेंका गया (लीन किया गया) अचेतन
यह जगत् भी चेतन ही हो जाता हे । जैसे लवणसागर में फेंका गया लवण का ढेला या सिन्धु में फेंका
गया सैंधव समुद्र में वा सिन्धु में प्रविष्ट होकर अपने नाम-रूप से विनिर्मुक्त हो समुद्ररूपता या
सिन्धुरूपता को प्राप्त कर लेता है या जैसे जल में छोड़ा गया जल, दूध में छोड़ा गया दूध और घी में
छोड़ा गया घी - ये सबके सब विनष्ट न होते हुए ही तद्रूप हो जाते हैँ, किसी विशेषरूप से (पृथकरूप
से) गृहीत नहीं होते वैसे ही सब भाव से नित्य-आनन्दस्वरूप, सर्वसाक्षी, परमकारण, चिदेकरस
परब्रह्म मे प्रविष्ट होकर मैं तद्रूप ही हो गया हूँ, पृथक्रूप से में गृहीत नहीं होता