Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
अहमेकः परं ब्रह्म इत्यात्मान्तः प्रकाशते ।
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
सखे संन्यस्य कर्माणि ब्रह्मणः प्रणयी भव ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह भरद्वाज के द्वारा कहे गये अनुभव को चुनकर सन्तुष्ट हुए वाल्मीकि मुनि भरद्वाज के
अनुभव को दृढ़ करने के लिए अवश्य कर्तव्यरूप से (त्यजतैव हि तज्जय त्यक्तु प्रत्यक् परं पदम्“
इत्यादि श्रुति से सिद्ध सन्यास का उपदेश देते हैं।
वाल्मीकि मुनि ने कहा : हे मित्र, संसारचक्र के आवर्त में भ्रमण करते हुए यदि तुम गृहस्थी में
विश्रान्तिसुख की प्राप्ति नहीं कर रहे हो, तो सब कर्मो को छोडकर एकमात्र ब्रह्म में ही बिना किसी
विक्षेप के आसक्त हो जाओ, क्योकि ्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति" इस श्रुति के अनुसार यह निश्चित
है कि किसी दूसरे व्यापार मेँ तत्पर न रहकर केवल ब्रह्म मेँ आसक्त हुए संन्यासी की ही मूल-सहित
भ्रान्ति की शान्ति हो जाती है । तात्पर्य यह कि एकमात्र संन्यासी को ही शान्ति-सुख मिलता
है