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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 85–93

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 85–93 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 85-93

संस्कृत श्लोक

क्वचिन्मुक्त इवात्मस्थः क्वचित्तुर्यपदाभिधः । क्वचित्प्रणीतप्रकृतिः क्वचित्तत्स्थः पुमानयम् ॥ ८५ ॥ अयं त्रयीमयो देवस्त्रैगुण्यगहनातिगः । जयत्यङ्गैरयं षड्भिर्वेदात्मा पुरुषोऽद्भुतः ॥ ८६ ॥ अयं चतुर्बाहुरयं विश्वस्रष्टा चतुर्मुखः । अयमेव महादेवः संहर्ता च त्रिलोचनः ॥ ८७ ॥ अजोऽयं जायते योगाज्जागरूकः सदा महान् । बिभर्ति भगवानेतद्विरूपो विश्वरूपवान् ॥ ८८ ॥ विजयो विक्रमेणेव प्रकाश इव तेजसा । प्रज्ञोत्कर्षः श्रुतेनेव सुपर्णेनायमुह्यते ॥ ८९ ॥ अयं दशरथो धन्यः सुतो यस्य परः पुमान् । धन्यः स दशकण्ठोऽपि चिन्त्यश्चित्तेन योऽमुना ॥ ९० ॥ हा स्वर्गममुना शून्यं हा पातालादिहागतः । तस्यागमादयं लोको मध्यमः श्रेष्ठतां गतः ॥ ९१ ॥ राम इत्यवतीर्णोऽयमर्णवान्तःशयः पुमान् । चिदानन्दघनो रामः परमात्मायमव्ययः ॥ ९२ ॥ निगृहीतेन्द्रियग्रामा रामं जानन्ति योगिनः । वयं त्ववरमेवास्य रूपं रूपयितुं क्षमाः ॥ ९३ ॥

हिन्दी अर्थ

यही भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी ज्ञानयुक्त, नित्यमुक्त, माया के नियामक तथा माया के भीतर बद्ध - यों चार प्रकार से स्थित हैं, यह कहते हैं। यही परम पुरुष भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी कहीं पर ज्ञान से मुक्त, कहीं पर तुर्यपदाभिधेय अपने स्वरूप में स्थित अतएव नित्यमुक्त, कहीं पर प्रकृति (माया) के नियामक और कहीं पर माया के भीतर बद्ध हुए-से मालूम पड़ते हैं। यही भगवान्‌ वेदमय शरीरधारी हैं, तीनों गुणों से परे अति गहन यही हैं और शिक्षा कल्प आदि छः अंगों से समन्वित वेदात्मा अद्भुत पुरुष यही हैं। विश्व का पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णु भगवान यही हैं, विश्व के रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और सारे संसार का संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान्‌ महादेव भी यही हैं । ये अजन्मा होते हुए भी अपनी शक्ति के सम्बन्ध से जन्म लेते हैं, ये सबसे महान्‌ हैं, मोहरूपी नींद में सोये हुए न रहने के कारण ये सदा जागरूक रहते हैं और रूपरहित होते हुए भी ये भगवान्‌ इस विश्व को धारण करते हैं| जैसे पराक्रम से विजय प्राप्त की जाती है, तेज से जैसे भास्वररूप प्रकाश धारण किया जाता है, जैसे सुने गये शास्त्र से प्रज्ञा में उत्कर्ष प्राप्त किया जाता है वैसे ही ये भी भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी श्रीगरूडजी से ढोये जाते हैं। ये राजा दशरथजी धन्य हैं, जिनके पुत्र परम पुरुष साक्षात्‌ भगवान्‌ हुए। वह दशकण्ठ रावण भी धन्य है, जिसका ये अपने चित्त से यानी यह रावण मेरा दुश्मन है - इस रूप से चिन्तन करेगे । हा, विष्णुशरीरधारी इनसे शून्य स्वर्ग की दशा शोचनीय हो गयी है, और हा, शेषमूर्ति श्रीलक्ष्मणजी जो यहाँ पाताल से आ गये हैं, इसलिए उस पाताल की दशा भी अब शोचनीय हो गयी है। भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी के यहाँ आ जाने से यह भूलोक श्रेष्ठता को प्राप्त हो गया हे । क्षीरसागर में शयन करनेवाले विष्णु भगवान्‌ ही श्रीरामचन्द्रजी के रूप में अवतीर्णं हुए हे । ये ही श्रीरामचन्द्रजी चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं । अपनी इन्द्रियों को रोक रखनेवाले योगी लोग ही श्रीरामचन्द्रजी को वस्तुतः जानते हैं, हम लोग तो इनके इस छोटे स्वरूप का ही निरूपण या दर्शन करने में समर्थ हे