Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 26,27
संस्कृत श्लोक
भरद्वाज उवाच ।
अज्ञानं च प्रतिष्ठाः स्युर्लिङ्गमव्याकृते सति ।
इदानीं लिङ्गनिगडान्मुक्तोऽहं सर्वथा यतः ॥ २६ ॥
चिदंशत्वात्प्रविष्टोऽहं चैतन्यानन्दसागरे ।
अभेदात्परमात्मास्मि सर्वोपाधिविवर्जितः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह वाल्मीकि महाराज ने भरद्वाज को प्रणव के अर्थ का विस्तार कर बोध किया ओर इससे वे
ज्ञानी बन गये । अव भरद्वाज अपने अनुभव की परीक्षा करने के लिए उसे प्रकट करते हुए कहते हैँ ।
भरद्वाज ने कहा : महाराज, मैं अब सभी तरह से लिंगरूपी बेडी के बन्धन से निर्मुक्त हो गया हूँ
और चूँकि मैं चैतन्य का अंश हूँ, इससे चैतन्यरूपी आनन्दसागर में प्रविष्ट हो गया हू । अंश ओर
अंशवान् का असल में अभेद होने के कारण मैं समस्त उपाधियों से शून्य परमात्मा ही हू । मैं कूटस्थ,
शुद्ध, व्यापक और चैतन्यरूप हूँ; चैतन्यशक्तिमान् नहीं हूँ