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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । शान्तो दान्तश्चोपरतो निषिद्धात्काम्यकर्मणः । विषयेन्द्रियसंश्लेषसुखाच्च श्रद्धयान्वितः ॥ १ ॥ मृद्वासने समासीनो जितचित्तेन्द्रियक्रियः । ओमित्युच्चारयेत्तावन्मनो यावत्प्रसीदति ॥ २ ॥ प्राणायामं ततः कुर्यादन्तःकरणशुद्धये । इन्द्रियाण्याहरेत्पश्चाद्विषयेभ्यः शनैःशनैः ॥ ३ ॥ देहेन्द्रियमनोबुद्धिक्षेत्रज्ञानां च संभवः । यस्माद्भवति तज्ज्ञात्वा तेषु पश्चाद्विलापयेत् ॥ ४ ॥ विराजि प्रथमं स्थित्वा तत्रात्मनि ततः परम् । अव्याकृते स्थितः पश्चात्स्थितः परमकारणे ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

“शान्तो दान्त उपरतस्तितिश्चः श्रद्धावित्तः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति इत्यादि श्रुति के तात्पर्य के वर्णन द्वारा साक्षात्कारपर्यत सागोपाग प्रपंच के प्रविलापन का प्रकार कहने के लिए उपक्रम करते है । वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, शम, दम, उपरति यानी काम्य ओर निषिद्ध कर्मो के परित्याग से एवं विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्बन्ध से जनित सुख से (विषयासक्ति से) शून्य, श्रद्धा से युक्त मुलायम आसन पर बैठकर चित्त ओर इन्द्रियों की क्रियाओं को जीत करके योगी तब तक ॐकार का उच्चारण करता रहे अर्थात्‌ दीर्घता से जप करता रहे, जब तक मन प्रसन्न न हो जाय | तदनन्तर अपने अन्तःकरण की शुद्धि के लिए प्राणायाम करे ओर उसके पीछे विषयों से इन्द्रियों को धीरे-धीरे खींच ले । देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि ओर कषेत्रज्ञ इनमे जिस-जिस की जिस-जिस उपादान कारण से उत्पत्ति हुई है, उस उसको जानकर यानी श्रुति आदि के द्वारा अनुसन्धान कर पीछे उनके उपादान कारणभूत उन- उन भूतो और देवों मे उन सबका लय कर दे । इस तरह आध्यात्मिक देह, इन्द्रिय आदि भाव को छोडकर “उनका कारणभूत देवतासमष्टिरूप अकारार्थ विराट्‌ मैं ही हूँ" इस तरह की भावना से पहले विराट्‌ में स्थित होकर; उसके बाद उसके कारणभूत उकारार्थ सूक्ष्मभूत लिंगसमष्टयात्मक हिरण्यगर्भ में उस विराट्‌ का लय करके "हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ” इस भावना से स्थित रह जाय | तदनन्तर उसके कारणभूत त्रिगुणात्मक माया से उपहित मकारार्थ अव्याकृत में उस हिरण्यगर्भ का भी लय करके "अव्याकृतस्वरूप मै ही हूँ” इस भावना से स्थित हो जाय । उसके पश्चात्‌ सम्पूर्ण जगत्‌ के मूलकारणरूप से उपलक्षित अव्याकृतसहित सबके अधिष्ठानभूत अर्धमात्रा से लक्षित परमकारण शुद्धब्रह्म में उस अव्याकृत का भी लय करके स्थित हो जाय

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड्डाईसवाँ सर्ग प्रविलापनयुक्ति से भरद्राज मुनि की कृतार्थता, ज्ञानियों के कर्तव्य तथा राम के व्युत्थापन का क्रम-यह वर्णन |