Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
रामोऽप्ययं विशुद्धात्मा विरक्तः स्वात्मनैव हि ।
विभ्रान्तिमात्राकाङ्क्षी च संवादात्प्राप्तवान्पदम् ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी अच्छे शिष्य है, यह दशति है।
आपके शिष्य श्रीरामचन्द्रजी भी विशुद्धात्मा ओर स्वयं विरक्त थे, केवल आत्मा में विश्रान्ति चाह
रहे थे, सो आपके संवाद से परम पद को प्राप्त हो गये