Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 107–109

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 107–109 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 107-109

संस्कृत श्लोक

सुखी भव महाराज रामचन्द्र नमोऽस्तु ते । वसिष्ठेनाप्यनुज्ञाता गच्छामोऽद्य यथागतम् ॥ १०७ ॥ श्रीवाल्मीकिरुवाच । एवमुक्त्वा गताः सर्वे रामसंस्तवने रताः । रामचन्द्रस्य शिरसि पौष्पी वृष्टिः पपात ह ॥ १०८ ॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं रामचन्द्रकथानकम् । अनेन क्रमयोगेन भरद्वाज सुखी भव ॥ १०९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महाराज श्रीरामचन्द्रजी, आप सुखी होइये, आपको नमस्कार हँ । अब हम लोग वसिष्ठजी से भी अनुमति लेकर जहाँ से आये थे वहीं जा रहे हैँ । वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, यों कहकर भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी की स्तुति करते हुए वे सबके सब चल दिये ओर श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर फूलों की वृष्टि होने लगी । हे भरद्वाज, श्रीरामचन्द्रजी की यह सब पूरी कथा मैंने तुसे कह सुनायी, इसी क्रम से तुम भी अपना सब कार्य करते हुए सुखी रहो