Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
शिष्यप्रज्ञैव बोधस्य कारणं गुरुवाक्यतः ।
मलत्रयमपक्वं चेत्कथं बुद्ध्यति पक्ववत् ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
गुरुवाक्यश्रवण से होनेवाले बोध में शिष्य
की बुद्धि ही कारण है । काम, कर्म ओर वासनारूप तीनों मलों का यदि परिपाक नहीं हुआ है, तो
परिपक्व की नाई फिर शिष्य कैसे जान सकता हे