Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 94–101
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 94–101 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 94-101
संस्कृत श्लोक
रघोरघोच्छेदकरो भगवानिति शुश्रुम ।
वसिष्ठ कृपया त्वं हि व्यवहारपरं कुरु ॥ ९४ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्त्वावस्थितस्तूष्णीं विश्वामित्रो महामुनिः ।
वसिष्ठस्तु महातेजा रामचन्द्रमभाषत ॥ ९५ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
राम राम महाबाहो महापुरुष चिन्मय ।
नायं विश्रान्तिकालो हि लोकानन्दकरो भव ॥ ९६ ॥
यावल्लोकपरामर्शो निरूढो नास्ति योगिनः ।
तावद्रूढसमाधित्वं न भवत्येव निर्मलम् ॥ ९७ ॥
तस्माद्राज्यादिविषयान्पर्यालोक्य विनश्वरान् ।
देवकार्यादिभारांश्च भज पुत्र सुखी भव ॥ ९८ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तोऽपि यदा रामः किंचिन्नोचे लयं गतः ।
तदा सुषुम्नया सोऽपि विवेश हृदयं शनैः ॥ ९९ ॥
शक्तिप्राणमनःप्रसक्तिकरणो जीवः प्रकाशात्मको नाडीरन्ध्रसुपुष्टसर्वकरणः प्रोन्मील्य नेत्रे शनैः ।
दृष्ट्वोत्कृष्टवसिष्ठमुख्यविदुषो निर्मुक्तसर्वैषणः कृत्याकृत्यविचारणादिरहितः सर्वान्प्रतीक्ष्य स्थितः ॥ १०० ॥
श्रुत्वा वसिष्ठवचनं गुरुवाक्यमिति स्वयम् ।
श्रुत्वा प्रोवाच भगवान्रामचन्द्रः समाहितः ॥ १०१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्होंने अपने अवतार से रघु के वंश को भी पवित्र कर डाला है, यह कहते हैं।
हे वसिष्ठजी, हम लोगों ने ऐसा सुना है कि ये ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी रघु के वंश के पापों का
उच्छेद करनेवाले हैं। अब आप कृपाकर इन्हे व्यवहार में लगाइये वाल्मीकिजी ने कहा : हे भरद्वाज, यों
कहकर महामुनि विश्वामित्रजी चुपचाप बैठ गये, परंतु महातेजस्वी महाराज वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी
से कहने लगे : हे रामजी, हे महावाहो, हे चिन्मय महापुरुष, यह आत्मा में विश्रान्ति का समय नहीं है ।
(उविये, आइये) कुछ दिन तक अभी इस संसार के लिए आनन्दकारक बनिये । जब तक लोग उत्तम
अधिकार प्राप्त नहीं करते तब तक योगी को निर्मल समाधि में बैठ जाना युक्त नहीं होता | इसलिए हे
पुत्र, कुछ काल तक विनाशी राज्य आदि विषयों का अनुभव करके तथा देवताओं के कार्य आदि अपने
ऊपर लिये गये अधिकार भार को समाप्त करके पीछे समाधि लगाओ ओर सुखी रहो । वाल्मीकिजी ने
कहा : इस तरह महाराज वसिष्ठजी के कहने पर ब्रह्म के साथ एेक्य को प्राप्त हुए श्रीरामचन्द्रजी बाह्य
अर्थो को न सुनने से तथा वाणी आदि इन्द्रियों की चेष्टाओं का उपरम हो जाने से जव कुछ भी न बोल
सके तब वसिष्ठ महाराज उनके शरीर में संकल्प द्वारा प्रविष्ट होकर उनकी सुषुम्ना नाड़ी से धीरे-धीरे
हृदयकमल में जा पहुँचे । वहाँ पहुँचकर उनके विलीन हुए जीवोपाधि लिंग शरीर को घनीभूत बनाकर
उसे बाहर ऐसे खींच लाये, जैसे बीज के अन्दर प्रविष्ट होकर वायु बीजान्तर्गत अंकुर को बाहर खींच
लाती हे । पहले प्राण आदि बीजभूत आधारशक्ति में, उसके बाद प्राणों का आविर्भाव होने पर प्राणो में
ओर तत्पश्चात् मन का आविर्भाव होने पर मन में चिदाभासरूप से क्रमशः प्रवेश करनेवाला प्रकाशात्मक
जीव - प्राण द्वारा सम्पूर्ण नाड़ी रन्दो मे प्रवेश करके समस्त ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों को आविष्कृत
करते हुए धीरे से आँखें खोलकर बाहर बैठे हुए अपने पूज्य वसिष्ठ आदि विद्वानों को देख करके स्वयं
कृतकृत्य होने के कारण समस्त अभिलाषाओं से शून्य, कृत्य एवं अकृत्य (अवश्य कर्तव्य ओर त्याज्य)
के व्यवहार के गुण और दोषों की चिन्ता से तथा इनको करने या न करने से होनेवाली हानि ओर लाभ
की चिन्ता से रहित होते हुए “अव ये लोग इस तरह मुझसे क्या कहते है", इस अभिप्राय से उन सबकी
प्रतीक्षा कर - स्थित रहा | तदनन्तर हे राम, हे राम, हे महाबाहो, इत्यादि पहले जो कहा गया महाराज
वसिष्ठजी का वचन था, वही फिर उन्हींके द्वारा सुनाया गया, उसे सुनकर एवं यह गुरुवाक्य अनुल्लंघनीय
है - इस अपने पिता की तथा बन्धुओं की प्रार्थना को भी सुन करके सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपने
अवतार का मतलब समझते हुए सावधान होकर कहने लगे